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सरकारी दफ्तर में गुंडागर्दी: जनसंपर्क अधिकारी पर हमला, पत्रकारिता की आड़ में अराजकता का बोलबाला

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आशीष मिश्रा
रायपुर। छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ संवाद कार्यालय में विभागीय अपर संचालक संजीव तिवारी के साथ हुई अभद्रता, झूमा-झटकी और तोड़फोड़ की घटना ने राज्य की प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना केवल एक शासकीय अधिकारी पर हमला नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि राजधानी के अति संवेदनशील सरकारी कार्यालयों में भी सुरक्षा व्यवस्था कितनी लचर है, जहां कथित पत्रकारों द्वारा बेरोकटोक गुंडागर्दी की जा सकती है।
इस घटना के बाद बहुत से पत्रकार संगठनों ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे ‘पूरे पत्रकारिता जगत पर आघात’ बताया है, लेकिन यह निंदा स्वयं पत्रकारिता जगत में व्याप्त गहरे सड़न की ओर इशारा करती है।
खोखली निंदा और अराजकता का प्रमाण
एक संगठन द्वारा विज्ञप्ति जारी कर इस हमले को एक ‘योजनाबद्ध और सोची-समझी साजिश’ करार दिया। हालांकि, यह स्वीकार करना कि हमलावर ‘असामाजिक तत्व’ पत्रकारिता की आड़ में गुंडागर्दी कर रहे हैं, मीडिया बिरादरी की गिरती विश्वसनीयता और आत्म-नियंत्रण में विफलता को रेखांकित करता है।
वरिष्ठ अधिकारियों और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि जब पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वालासंगठन ही यह मान रहा है कि उसके पेशे में गुंडे और असामाजिक तत्व घुस चुके हैं, तो यह स्पष्ट है कि राज्य में तथाकथित ‘पत्रकार’ अब कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन गए हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मीडिया के नाम पर ब्लैकमेलिंग और धमकाने वाले तत्वों पर संस्थानिक नियंत्रण पूरी तरह से ढीला पड़ चुका है।
प्रशासनिक लकवा और सुरक्षा में सेंध
घटनाक्रम पर सबसे बड़ा सवाल शासकीय कार्यालय की सुरक्षा व्यवस्था पर उठता है। नवा रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ संवाद कार्यालय एक महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठान है। इसके बावजूद, कथित हमलावरों का एक साथ शासकीय कार्यालय में प्रवेश करना, वरिष्ठ अधिकारी के साथ खुलेआम बदसलूकी करना और सरकारी संपत्ति को क्षतिग्रस्त करना राज्य प्रशासन की गंभीर विफलता को दर्शाता है।
सवाल यह है कि जब राजधानी के एक प्रमुख विभाग के अधिकारी सरकारी परिसर में सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा का क्या होगा? यह घटना केवल एक हमला नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक मशीनरी के मुंह पर एक तमाचा है, जो दिखाता है कि धमकियों और अराजकता के सामने अधिकारी कितने मजबूर हैं।
विभिन्न संगठनों ने भले ही दोषियों के विरुद्ध कठोर धाराओं के तहत कार्रवाई की मांग की है, लेकिन ग्राउंड जीरो पर स्थिति निराशाजनक है। जब तक पत्रकारिता की आड़ में पनप रहे इन असामाजिक तत्वों पर नकेल कसने के लिए मीडिया संगठनों द्वारा स्वयं के स्तर पर कठोर कदम नहीं उठाए जाते, तब तक ऐसी औपचारिक निंदाएं केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएंगी और सरकारी दफ्तरों में अराजकता का यह दौर जारी रहेगा।

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