रायपुर: छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित शराब घोटाला, जिसकी जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) और अन्य केंद्रीय एजेंसियां कर रही हैं, एक विस्तृत अवैध नेटवर्क को उजागर करता है जिसका अनुमानित मूल्य 2000 करोड़ रुपये से अधिक है। इस पूरे घोटाले का केंद्र बिंदु एक विशिष्ट अवैध विक्रय प्रणाली थी, जिसे जांच एजेंसियों ने ‘पार्ट 2 शराब’ की संज्ञा दी है।
यह ‘पार्ट 2’ सिस्टम न केवल सरकारी खजाने को चूना लगाने का माध्यम था, बल्कि यह बताता है कि कैसे राजधानी रायपुर सहित राज्य भर में एक समानांतर अवैध शराब बाजार चलाया गया।
‘पार्ट 2 शराब’ क्या थी और इसका उद्देश्य क्या था?
‘पार्ट 2 शराब’ (Part 2 Liquor) कोई विशिष्ट नया ब्रांड नहीं था, बल्कि यह एक सिस्टम था जिसके तहत शराब की तस्करी, निर्माण और बिक्री की जाती थी, जिस पर राज्य उत्पाद शुल्क (Excise Duty) का भुगतान नहीं किया जाता था।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे घोटाले का ढांचा दो मुख्य भागों में काम करता था:
1. नकली होलोग्राम और कम गुणवत्ता वाली शराब: अधिकारियों ने पाया कि इस सिंडिकेट ने सरकारी डिस्टिलरी और बॉटलिंग इकाइयों में अवैध रूप से हस्तक्षेप किया। इसके तहत, आधिकारिक बॉटलिंग के अलावा, अतिरिक्त शराब की बॉटलिंग की जाती थी। इस अवैध शराब पर राज्य सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले होलोग्राम के नकली होलोग्राम चिपकाए जाते थे।
2. अवैध और टैक्स-मुक्त राजस्व: प्रत्येक शराब की बोतल पर एक निश्चित राशि (आमतौर पर 75 रुपये से 150 रुपये प्रति पेटी) फिक्स की जाती थी। यह राशि सीधे सरकारी खजाने में जाने के बजाय, सिंडिकेट के सदस्यों और उच्च-स्तरीय राजनीतिक एवं प्रशासनिक लाभान्वितों के लिए अवैध राजस्व के रूप में एकत्र की जाती थी। यही टैक्स-मुक्त और ब्लैक मनी की बिक्री ‘पार्ट 2 शराब’ कहलाती थी।
यह अवैध स्टॉक मुख्य रूप से देशी शराब (Country Liquor – CL) और भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) के सस्ते वेरिएंट का होता था, जिसे आधिकारिक दुकानों के माध्यम से बेचा जाता था ताकि ग्राहकों को इसका नकली होना पता न चले।
रायपुर में कौन चलाते थे यह अवैध नेटवर्क?
चूँकि रायपुर राज्य की राजधानी और सबसे बड़ा उपभोक्ता केंद्र है, इसलिए यह अवैध ‘पार्ट 2’ बिक्री का सबसे बड़ा हब भी था। ED की चार्जशीट और दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क को एक संगठित सिंडिकेट द्वारा चलाया जाता था, जिसे उच्च प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।
रायपुर में इस अवैध शराब की बिक्री और वितरण को संभालने वाले मुख्य व्यक्तियों और ढांचों में निम्नलिखित शामिल थे:
1. सिंडिकेट के मुख्य ऑपरेटर
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे सिंडिकेट का संचालन कुछ प्रमुख व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा था। इनमें प्रमुख रूप से अनवर ढेबर (Anwar Dhebar) और उनके सहयोगी शामिल थे, जिन्हें इस अवैध व्यवस्था का मुख्य आर्किटेक्ट बताया गया है।
रायपुर में ढेबर और उनके करीबी लोगों की जिम्मेदारी थी कि वे राज्य भर की बॉटलिंग इकाइयों से उत्पादन, होलोग्राम की आपूर्ति और फिर रायपुर व आसपास के जिलों में ‘पार्ट 2’ स्टॉक की आपूर्ति सुनिश्चित करें।
2. रिटेल वेंडिंग और ठेका व्यवस्था
रायपुर में ‘पार्ट 2’ शराब की बिक्री मुख्य रूप से सरकारी शराब दुकानों के माध्यम से की जाती थी। इस सिंडिकेट ने छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CSMCL) के माध्यम से काम करने वाले विभिन्न प्राइवेट वेंडर और ठेकेदारों को नियुक्त किया था।
रोज़ की बिक्री का हिसाब: इन वेंडरों को निर्देश दिया जाता था कि वे आधिकारिक स्टॉक के साथ-साथ ‘पार्ट 2’ स्टॉक को भी बेचें। शाम को बिक्री खत्म होने के बाद, आधिकारिक बिक्री का हिसाब तो सरकारी खाते में जाता था, लेकिन ‘पार्ट 2’ की बिक्री का कैश सिंडिकेट के लोगों को अलग से पहुंचाया जाता था।
दुकान प्रबंधक और सुपरवाइजर: रायपुर की विभिन्न शराब दुकानों के प्रबंधक और सुपरवाइजर भी इस अवैध कमाई का हिस्सा थे। वे सुनिश्चित करते थे कि नकली होलोग्राम वाली शराब बिना किसी रुकावट के बिके और कोई शिकायत दर्ज न हो।
3. नकदी संग्रहण और उच्च-स्तरीय डिलीवरी
रायपुर में नकदी संग्रहण (Cash Collection) का काम अत्यंत गोपनीय तरीके से किया जाता था। जांच एजेंसियों ने पाया कि डेली कैश कलेक्शन के लिए विशेष कोडवर्ड का इस्तेमाल किया जाता था, और यह पैसा कई स्तरों से गुजरने के बाद अंततः उच्च-स्तरीय लाभार्थियों तक पहुंचाया जाता था, जिनमें कथित तौर पर कुछ राजनेता और वरिष्ठ नौकरशाह शामिल थे।
जांच की वर्तमान स्थिति
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत कार्रवाई की है और कई गिरफ्तारियां की हैं, जिनमें कथित तौर पर अनवर ढेबर, नितेश पुरोहित, और कई अन्य व्यावसायिक व प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं।
एजेंसी का दावा है कि ‘पार्ट 2 शराब’ प्रणाली के माध्यम से एकत्र किया गया अवैध धन राजनीतिक फंडिंग और व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग किया गया, जिससे राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हुआ। यह मामला फिलहाल न्यायपालिका के समक्ष लंबित है और इसकी विस्तृत जांच जारी है।



