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छत्तीसगढ़ के नए विधानसभा भवन के लिए बलि चढ़ा बस्तर का बेशकीमती सागौन

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रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी नवा रायपुर (अटल नगर) में बने नए और भव्य राज्य विधानसभा भवन की सुंदरता और मजबूती के पीछे एक बड़ी पर्यावरण लागत छिपी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रतिष्ठित सरकारी इमारत के आंतरिक सज्जा, फर्नीचर और फ्रेमिंग के लिए आवश्यक उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु बस्तर क्षेत्र के सघन वनों से हजारों की संख्या में सागौन (टीक/सैगोन) के बेशकीमती पेड़ों की कटाई की गई है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस कदम को ‘विकास के नाम पर सरकारी दोहन’ बताते हुए कड़ी आलोचना की है, जबकि वन विभाग ने लकड़ी के उपयोग को कानूनी और आवश्यक बताया है।

हजारों पेड़ों की कुर्बानी: क्यों चुना गया बस्तर का सागौन?

नवा रायपुर में निर्माणाधीन नया विधानसभा भवन सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि राज्य के गौरव का प्रतीक माना जा रहा है। इस परियोजना में उच्च गुणवत्ता और दीर्घायु सुनिश्चित करने के लिए, अधिकारियों ने स्थानीय रूप से उपलब्ध सर्वोत्तम सामग्री का उपयोग करने का निर्णय लिया। बस्तर का सागौन (Bastar Teak) अपनी असाधारण मजबूती, दीमक प्रतिरोधक क्षमता और सुनहरे रंग के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गुणवत्ता वाली इमारती लकड़ी को बनने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, विधानसभा भवन के विशाल हॉल, मंत्रियों के कक्षों, समिति कक्षों और लॉबी के लिए उपयोग किए गए फर्नीचर तथा साज-सज्जा का एक बड़ा हिस्सा सीधे बस्तर के जंगलों से लाए गए सागौन से तैयार किया गया है। अनुमान है कि इस परियोजना के लिए हजारों परिपक्व (Mature) सागौन के पेड़ों को काटा गया है, जिनमें से कई पेड़ 50 से 100 वर्ष पुराने थे।

पर्यावरणविदों ने उठाया सवाल

पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई की खबरें सामने आने के बाद राज्य के पर्यावरण संरक्षण समूहों ने चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि भले ही यह लकड़ी किसी सरकारी परियोजना के लिए इस्तेमाल की जा रही हो, लेकिन हजारों पेड़ों को रातोंरात खो देने का पर्यावरणीय नुकसान अपूरणीय है।
रायपुर स्थित एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने कहा, “हम विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमें यह समझना होगा कि एक विधानसभा भवन पाँच वर्षों में बन सकता है, लेकिन सागौन के एक पेड़ को अपनी पूर्णता तक पहुँचने में दशकों लगते हैं। बस्तर के जंगल राज्य का फेफड़ा हैं। राज्य के गौरव के लिए उनके फेफड़ों को काटना कहाँ का न्याय है?”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि व्यावसायिक रूप से मूल्यवान सागौन की कटाई के दौरान वन विभाग द्वारा निर्धारित नियमों और क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण मानकों का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया है।

सरकार का पक्ष: कानूनी प्रक्रिया का पालन

इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए, छत्तीसगढ़ वन विभाग और लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों ने पुष्टि की है कि लकड़ी की आपूर्ति बस्तर वन वृत्त के चिन्हित और अनुमोदित स्थानों से की गई थी।
वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “इस लकड़ी को अवैध रूप से नहीं काटा गया है। यह राज्य की कानूनी रूप से स्वीकृत संपत्ति थी, जिसका उपयोग राज्य के सबसे महत्वपूर्ण निर्माण कार्य में किया जा रहा है। बस्तर के सागौन को चुनने का निर्णय केवल गुणवत्ता के आधार पर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए भी लिया गया था कि सार्वजनिक धन का उपयोग करते हुए स्थानीय संसाधन को बढ़ावा दिया जाए।”

विकास बनाम संरक्षण की बहस जारी

यह घटना एक बार फिर भारत में विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच के चिरस्थायी द्वंद्व को उजागर करती है। नवा रायपुर का नया विधानसभा भवन छत्तीसगढ़ के लिए एक वास्तुशिल्प उपलब्धि हो सकता है, लेकिन बस्तर के जंगल जो कीमत चुका रहे हैं, वह आने वाले वर्षों में विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साधने की चुनौती को रेखांकित करता रहेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को केवल क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण पर निर्भर रहने के बजाय, भविष्य की बड़ी परियोजनाओं के लिए ऐसी सामग्री चुनने पर जोर देना चाहिए जो पर्यावरण पर कम से कम दबाव डालती हो।

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